कृषि विज्ञान केंद्र शहडोल एवं किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग शहडोल के संयुक्त तत्वावधान में 5 अक्टूबर 2026 को ग्राम नौखेड़िया, ब्लॉक सोहागपुर में प्राकृतिक खेती जागरूकता अभियान एवं कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में किसानों को प्राकृतिक खेती, फसल सुरक्षा, कीट प्रबंधन, उतेरा खेती एवं मृदा परीक्षण सहित कृषि से संबंधित विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी दी गई।
कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. मृगेंद्र सिंह ने किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए बीजामृत, जीवामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, अग्निस्त्र एवं दशपर्णी की तैयारी और उनके अनुप्रयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पिछले कई दशकों से फसलों के उत्पादन में वृद्धि के लिए रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों एवं खरपतवारनाशी दवाओं का प्रयोग बढ़ा है, जो मानव समाज एवं पर्यावरण दोनों के लिए अत्यंत हानिकारक है। इसी कारण वर्तमान समय में प्राकृतिक एवं जैविक खेती को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया जा रहा है।
खास बातें
- अधिकांश किसान इनसे निपटने के लिए रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग करते हैं, जिससे मिट्टी के स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण एवं जीव-जंतुओं पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।
- स्टिकी ट्रैप के उपयोग से फसलों को कीटों से होने वाले नुकसान में 40 से 50 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।
- डॉ. प्रजापति ने सीमित सिंचाई साधन वाले किसानों के लिए उतेरा खेती को भी महत्वपूर्ण विकल्प बताया।
उन्होंने बताया कि किसानों द्वारा बोई गई फसलों की नर्सरी एवं फसलों को भूमि जनित कीट, रोग और खरपतवार से काफी नुकसान होता है। ये कीट एवं रोग खेत की मिट्टी में पहले से मौजूद रहते हैं और अनुकूल मौसम मिलने पर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। अधिकांश किसान इनसे निपटने के लिए रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग करते हैं, जिससे मिट्टी के स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण एवं जीव-जंतुओं पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।
केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने किसानों को फसल सुरक्षा के लिए रासायनिक कीटनाशकों के दुष्प्रभाव से बचने के उपायों की जानकारी देते हुए बताया कि स्टिकी ट्रैप के साथ-साथ फेरोमोन ट्रैप भी कीट नियंत्रण के लिए उपयोगी एवं प्रभावशाली पाए गए हैं। ये रासायनिक कीटनाशकों की तुलना में बेहद सस्ते होते हैं। स्टिकी ट्रैप के उपयोग से फसलों को कीटों से होने वाले नुकसान में 40 से 50 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।
उन्होंने बताया कि स्टिकी ट्रैप विभिन्न रंगों की शीट होती हैं, जिन्हें फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को आकर्षित करने के लिए खेत में लगाया जाता है। प्रत्येक कीट किसी विशेष रंग की ओर आकर्षित होता है। उसी रंग की शीट पर चिपचिपा पदार्थ लगाकर उसे फसल की ऊंचाई से लगभग एक फीट ऊंचाई पर टांगने से कीट आकर्षित होकर शीट पर चिपक जाते हैं और फसल को नुकसान नहीं पहुंचा पाते।
डॉ. प्रजापति ने सीमित सिंचाई साधन वाले किसानों के लिए उतेरा खेती को भी महत्वपूर्ण विकल्प बताया। उन्होंने कहा कि जिन किसानों के पास सिंचाई के सीमित साधन होने के कारण रबी मौसम में खेत खाली पड़े रहते हैं, उनके लिए सघन खेती के रूप में उतेरा खेती उपयोगी साबित हो सकती है। उतेरा खेती का मुख्य उद्देश्य खेत में मौजूद नमी का उपयोग अगली फसल के अंकुरण एवं वृद्धि के लिए करना है।
उन्होंने बताया कि जहां वर्षा आधारित धान की खेती होती है, वहां धान की फसल की कटाई से 10 से 15 दिन पूर्व अलसी, मसूर, मटरी एवं तिवड़ा के बीजों का खेत में छिड़काव कर बुआई की जानी चाहिए। इससे धान की कटाई के समय बीज खेत में मौजूद नमी का उपयोग करते हुए अंकुरित हो जाते हैं। इसके बाद संचित नमी का उपयोग कर फसल पककर तैयार हो जाती है। इस प्रकार किसानों को धान के साथ-साथ दलहन एवं तिलहन की अतिरिक्त उपज भी प्राप्त हो सकती है।
आत्मा परियोजना से बीटीएम सुश्री जया मिश्रा एवं सुश्री शुभ्रा पयासी ने किसानों को मृदा परीक्षण के महत्व की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मिट्टी की शक्ति एवं उसकी स्थिति की जानकारी तभी प्राप्त हो सकती है, जब समय-समय पर मिट्टी का परीक्षण कराया जाए। कृषि में मृदा परीक्षण भूमि के नमूने की रासायनिक जांच है, जिसके माध्यम से भूमि में उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा की जानकारी प्राप्त होती है। इसका उद्देश्य भूमि की उर्वरता का आकलन करना तथा उसमें उपलब्ध पोषक तत्वों की कमी की पहचान करना है।
उन्होंने मृदा स्वास्थ्य कार्ड के संबंध में बताया कि इसमें मृदा का पीएच मान, ईसी, कार्बनिक पदार्थ, नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर, जिंक, लोहा, कॉपर, मैंगनीज एवं बोरान आदि से संबंधित जानकारी अंकित की जाती है तथा यह जानकारी किसानों को उपलब्ध कराई जाती है। इससे किसान अपनी मिट्टी की स्थिति के अनुसार संतुलित एवं उचित मात्रा में उर्वरकों का उपयोग कर सकते हैं।
कार्यक्रम में रिलायंस फाउंडेशन से श्री अजय पांडेय एवं श्री दिलीप नामदेव का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम के दौरान किसानों ने प्राकृतिक एवं जैविक खेती, फसल सुरक्षा, उतेरा खेती तथा मृदा स्वास्थ्य से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त कीं।




