ग्रामीण अंचलों में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन एक वरदान साबित हो रहा है। इसका एक जीवंत उदाहरण ग्राम खटाम्बा की स्व सहायता समूह की संतोष दीदी हैं, जिन्होंने आजीविका मिशन से जुड़कर न सिर्फ अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारा, बल्कि समाज में अपनी एक नई पहचान भी बनाई है।
स्व सहायता समूह से जुड़ने से पहले संतोष दीदी के परिवार की मासिक आय मात्र 05 हजार रुपये थी। आय का कोई स्थाई स्रोत न होने के कारण पूरा परिवार सामान्य खेती पर निर्भर था। सीमित आमदनी की वजह से परिवार को आए दिन कई तरह की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ता था। इस स्थिति में संतोष दीदी की समाज में स्वयं की कोई विशिष्ट पहचान भी नहीं थी।
खास बातें
- स्व सहायता समूह से जुड़ने से पहले संतोष दीदी के परिवार की मासिक आय मात्र 05 हजार रुपये थी।
- समूह के माध्यम से सीआईएफ राशि से 20 हजार का पहला ऋण लेकर संतोष दीदी ने उन्नत तरीके से टमाटर की खेती की।
- मंडी में अच्छा भाव मिलने से उन्होंने 01 लाख 50 हजार रूपये की बिक्री की, जिसने उनके हौसले को नई उड़ान दी।
संतोष दीदी के जीवन में टर्निंग पॉइंट तब आया, जब गाँव में आजीविका मिशन की टीम द्वारा एक विशेष प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। इस दौरान संतोष दीदी वहाँ पहुँचीं और उन्होंने समूह की कार्यप्रणाली और उससे होने वाले लाभों की विस्तृत जानकारी प्राप्त की। आजीविका टीम से मिले इस मार्गदर्शन ने उन्हें समूह से जुड़कर आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया।
इस प्रेरणा से आगे बढ़ते हुए संतोष दीदी वर्ष 2018 में विधिवत रूप से स्वं सहायता समूह से जुड़ीं। उन्होंने अपने समूह का नाम ' खुशी समूह ' रखा। संतोष दीदी का कहना है कि जब से वे इस समूह से जुड़ी हैं, तब से उनके जीवन और परिवार में खुशियों का आगमन होने लगा है।
समूह के माध्यम से उन्हें आर्थिक उन्नति के कई नए रास्ते मिले हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और आज वे समाज में सम्मानजनक जीवन जी रही हैं।
संतोष दीदी ने आजीविका मिशन के सहयोग से मिले ऋण का चरणबद्ध तरीके से सही उपयोग कर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया। समूह के माध्यम से सीआईएफ राशि से 20 हजार का पहला ऋण लेकर संतोष दीदी ने उन्नत तरीके से टमाटर की खेती की। मंडी में अच्छा भाव मिलने से उन्होंने 01 लाख 50 हजार रूपये की बिक्री की, जिसने उनके हौसले को नई उड़ान दी।
इसके बाद 40 हजार रूपये की सीसीएल राशि का ऋण लेकर उन्होंने गाय खरीदी और दुग्ध उत्पादन का काम शुरू किया। वर्तमान में उनके पास 2 देशी, 02 एचएफ और 0 1 साहीवाल नस्ल की कुल 5 गाएं हैं, जिससे वे प्रतिदिन 10 से 15 लीटर दूध का विक्रय कर रही हैं। खेती को और आधुनिक बनाने के लिए उन्होंने 40 हजार का तीसरा ऋण लिया।
इससे ड्रिप इरिगेशन और थ्री-लेयर फार्मिंग तकनीक अपनाकर गिल्खी, टमाटर और खीरा जैसी सब्जियां उगाईं। सीजन के दौरान वे प्रतिदिन 1500 से 2000 रुपये के कैरेट बेचकर बड़ा मुनाफा कमा रही हैं। संतोष दीदी कहती हैं, " आजीविका मिशन और कृषि विभाग ने जो पहचान और आर्थिक मजबूती दी है, उसे अपने तक सीमित नहीं रखना चाहती।
अब उनके भविष्य का सपना है कि ग्राम की सभी महिलाओं को विभिन्न आजीविका गतिविधियों से जो डे और उन सभी को आत्मनिर्भर बनाकर ' लखपति दीदी ' के रूप में स्थापित करें।"
आजीविका मिशन की मदद और कृषि विभाग के तकनीकी सहयोग से प्रशिक्षित होकर संतोष दीदी ने केवल अपने जीवन को संवारा है, बल्कि कृषि सीआरपी के रूप में एक नई पहचान बनाई है। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद, इस कृषि सीआरपी ने क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्राकृतिक खेती का अलख जगाया है।
इनके मार्गदर्शन और प्रयासों से वर्तमान में 125 महिला और पुरुष किसानों ने अपने खेतों में पूरी तरह से प्राकृतिक खेती अपना ली है। इस कार्य के लिए हितग्राही को शासन के नियमानुसार समय पर मानदेय भी प्राप्त हो रहा है। आजीविका गतिविधियों से जुड़कर संतोष दीदी आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुक ी हैं।
खेत में उन्नत सब्जी उत्पादन और प्राकृतिक खेती के मानदेय को मिलाकर उन्हें हर महीने 15 हजार रुपये से अधिक की शुद्ध आमदनी हो रही है। इससे उनके परिवार का जीवन स्तर काफी बेहतर हुआ है।


