धागों में शहर का परिचय

नर्मदा किनारे महेश्वर की पहचान उसके घाटों और किले के साथ बुनाई से भी बनती है। मध्य प्रदेश पर्यटन महेश्वरी वस्त्रों में कपास और रेशम के धागों के मेल तथा अहिल्याबाई होलकर के दौर में इस परंपरा को मिले संरक्षण का उल्लेख करता है।

करघे से बाजार तक

किसी वस्त्र को समझने में उसका रंग ही नहीं, बुनावट और उसे बनाने वाले हाथ भी मायने रखते हैं। पर्यटन विभाग की जानकारी में REHWA Society के माध्यम से इस शिल्प को समर्थन देने की कहानी भी आती है। यह समाज 1979 में स्थापित हुआ था।

यात्रा में हुनर को जगह दें

महेश्वर जाएँ तो अधिकृत या स्थानीय रूप से उपलब्ध बुनाई अनुभव के बारे में जानकारी लें। कपड़े की बनावट, देखभाल और बनाने की प्रक्रिया पर कारीगर से बातचीत, खरीद को अधिक अर्थपूर्ण बना सकती है।

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